Follow Us:

हिमाचल में लंपी का कहर, 2,500 पशु संक्रमित और 90 की मौत; सिरमौर-ऊना सबसे ज्यादा प्रभावित

हिमाचल में लंपी का प्रकोप बढ़ा, करीब 2,500 पशु संक्रमित और 90 की मौत
सिरमौर में 2,064 और ऊना में 438 पशु चपेट में, दोनों जिले सबसे ज्यादा प्रभावित
गांव-गांव टीकाकरण अभियान तेज, पशुओं में लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क की सलाह


शिमला। हिमाचल प्रदेश में पशुओं पर लंपी रोग का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदेश में अब तक करीब 2,500 पशु इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आ चुके हैं, जबकि करीब 90 पशुओं की मौत हो चुकी है। बीमारी का सबसे ज्यादा असर सिरमौर और ऊना जिलों में सामने आया है। इसके अलावा सोलन, बिलासपुर, हमीरपुर और मंडी समेत अन्य क्षेत्रों में भी संक्रमण के मामले सामने आए हैं। बढ़ते खतरे को देखते हुए पशुपालन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने के साथ युद्ध स्तर पर टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया है।

विभाग की टीमें गांव-गांव पहुंचकर पशुओं का टीकाकरण कर रही हैं। अब तक प्रदेश में 10,382 पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है। विभाग का प्रयास है कि बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जाए, ताकि संक्रमण दूसरे पशुओं में न फैले और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके।

लंपी रोग को लेकर सबसे ज्यादा चिंता उन पशुपालकों की है, जिनके लिए पशुधन परिवार की आय का महत्वपूर्ण साधन है। बीमारी फैलने पर पशु की सेहत के साथ दूध उत्पादन और पशुपालक की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में विभाग ने पशुपालकों से बीमारी के लक्षणों को नजरअंदाज न करने और समय पर चिकित्सकीय सहायता लेने की अपील की है।

सिरमौर में सबसे ज्यादा संक्रमण, 47 पशुओं की मौत

प्रदेश में सिरमौर जिला लंपी रोग से सबसे ज्यादा प्रभावित बताया गया है। यहां अब तक 2,064 गोवंश संक्रमित पाए गए हैं। इनमें से 47 पशुओं की मौत हो चुकी है। संक्रमण का यह आंकड़ा प्रदेश के अन्य जिलों की तुलना में काफी अधिक है, जिससे सिरमौर में बीमारी को लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है।

इसके बाद ऊना में संक्रमण का बड़ा असर देखने को मिला है। जिले में 438 पशु संक्रमित हुए हैं। इनमें से 257 पशु उपचार के बाद स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि 21 पशुओं की मौत हुई है। ऊना में बड़ी संख्या में पशुओं के स्वस्थ होने से विभाग के उपचार और निगरानी प्रयासों को कुछ राहत भी मिली है, लेकिन संक्रमण को पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए लगातार निगरानी जरूरी है।

बिलासपुर में अब तक 169 पशु संक्रमित पाए गए हैं। इनमें से 94 पशु उपचार के बाद स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि आठ पशुओं की मौत हुई है। मंडी में 55 संक्रमित पशु मिले हैं और एक पशु की मौत हुई है। वहीं चंबा में अब तक तीन पशुओं की मौत की सूचना है।

जिलेवार स्थिति

जिला संक्रमित पशु स्वस्थ मौत
सिरमौर 2,064 47
ऊना 438 257 21
बिलासपुर 169 94 8
मंडी 55 1
चंबा 3

जर्सी गाय, बैल और बछड़ों में ज्यादा असर

पशुपालन विभाग के अनुसार जर्सी गाय, बैल और बछड़ों में लंपी संक्रमण का असर अपेक्षाकृत ज्यादा देखा जा रहा है। इसके मुकाबले स्थानीय और देसी नस्ल के पशुओं में संक्रमण के मामले कम सामने आए हैं।

पशुपालकों को खास तौर पर पशुओं की त्वचा और सामान्य व्यवहार पर नजर रखने की सलाह दी गई है। यदि पशु के शरीर पर गांठें, बुखार, कमजोरी या बीमारी के अन्य लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य बीमारी समझकर घर पर उपचार करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। ऐसे लक्षण दिखने पर तत्काल पशु चिकित्सक से संपर्क करना जरूरी है।

संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से रखें अलग

लंपी एक संक्रामक वायरल बीमारी है। इसलिए संक्रमित या संदिग्ध पशु को स्वस्थ पशुओं के साथ रखने से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है। विभाग ने सलाह दी है कि बीमारी के लक्षण वाले पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग रखा जाए।

पशुशाला की साफ-सफाई पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। पशुओं के रहने की जगह को साफ और स्वच्छ रखने के साथ बीमारी की स्थिति में विभागीय कर्मचारियों और पशु चिकित्सकों की सलाह का पालन करना महत्वपूर्ण है।

विभाग की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में संक्रमित पशुओं की निगरानी के साथ उनके उपचार पर भी नजर रख रही हैं। संदिग्ध मामलों की पुष्टि के लिए पशुओं के नमूने राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान, भोपाल भेजे जा रहे हैं। इससे संक्रमण की स्थिति की वैज्ञानिक पुष्टि करने और बीमारी पर नियंत्रण के प्रयासों को दिशा देने में मदद मिल रही है।

क्या है लंपी रोग और कैसे पहचानें

लंपी रोग पशुओं में होने वाली एक संक्रामक वायरल बीमारी है। इसमें संक्रमित पशु की चमड़ी के नीचे गांठें बनने लगती हैं। इसके साथ बुखार और कमजोरी जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। बीमारी बढ़ने पर पशु की हालत गंभीर हो सकती है।

इसलिए पशुपालकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे पशु में शरीर पर असामान्य गांठ, बुखार या कमजोरी जैसे संकेत दिखाई देने पर तुरंत सतर्क हो जाएं। समय पर पहचान, संक्रमित पशु को अलग रखना और पशु चिकित्सक की देखरेख में उपचार संक्रमण को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

पशुपालन विभाग ने पशुपालकों से टीकाकरण अभियान में सहयोग करने और अपने पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाने की अपील की है। विभाग का कहना है कि बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर पशुपालक स्वयं उपचार करने के बजाय पशु चिकित्सक से संपर्क करें।

पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. संजीव कुमार धीमान ने पशुपालकों से अपील की है कि वे टीकाकरण अभियान में सहयोग करें और अपने पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं। उनका कहना है कि बीमारी के लक्षण सामने आने पर स्वयं उपचार करने के बजाय विशेषज्ञ पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

फिलहाल सिरमौर और ऊना में संक्रमण की स्थिति सबसे ज्यादा चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में विभाग की निगरानी, टीकाकरण और उपचार अभियान के साथ पशुपालकों की सतर्कता भी बीमारी पर नियंत्रण में अहम भूमिका निभाएगी। पशुओं में शुरुआती लक्षण पहचानकर समय पर कदम उठाना न केवल संक्रमण को फैलने से रोक सकता है, बल्कि पशुपालकों के पशुधन और आजीविका को भी बचाने में मदद कर सकता है।